इतिहास

‘मुगल’ इतिहास में एक समृद्ध गाँव हंडिया, हरदा के पश्चिम में स्थित था।

कुछ वर्षों के बाद हरदा और महमूदाबाद का क्षेत्र बढ़ जाता है।

ब्रिटिश शासन के समय में, ब्रिटिश शासन ने हरदा को प्रगतिशील ढांचा में लाने की कोशिश की। हरदा जिला – कुलहरदा और महमूदाबाद गांवों को मिलाकर बनाया गया |

रेलवे लाइन मिलने के बाद हरदा का तेजी से विकास हुआ। 1857 में ब्रिटिश अधिकारियों ने यहां न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारियों के रूप में काम किया।

हरदा पुराने ‘मध्य प्रान्त’ के बड़े स्थान में से एक था और इसमें ‘सिवनीमालवा’ का क्षेत्र भी शामिल था । भाषा की धारणा में, हरदा जिले कि भाषा और संस्कृति पर ‘मालवा’ और ‘निमाड़’ का प्रभाव मिलता है। हरदा की मुख्या भाषा भुआनी थी एवं इस क्षेत्र को भुआना क्षेत्र कहा जाता है। भुवाना का अर्थ अधिक उर्वरक भूमि से है।

हरदा के दक्षिण पहाड़ी क्षेत्र में हम आदिवासी, ‘गोंड’ और ‘कोरकू’ लोग पाए सकते हैं। पहले हरदा के दक्षिण क्षेत्र में ‘मकदई’ शासन था और ‘गोंड’ राजा शासक थे । हरदा जिले का ‘बिहोला’ गाँव मुगल शासन का राजस्व केंद्र था।

‘गोंडवाना’ क्षेत्र – ब्रिटिश शासन में गैर-आदिवासी बन गया । श्रमिक, प्रशासन के अधिकारी, किसान और व्यापारिक समुदाय महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों से पिछले 150 वर्षों से संपर्क में थे, इसलिए हरदा क्षेत्र इन सभी राज्यों की संस्कृति से प्रभावित हुआ |

18 मई 1867 को ब्रिटिशों ने हरदा में नगर पालिका की स्थापना की और वर्ष 1920 से गणतंत्र के अनुसार काम किया गया। हरदा में अंडर ग्राउंड ड्रेनेज ब्रिटिश वास्तुकार का सबसे अच्छा उदाहरण है। प्रशासन के उद्देश्य से तहसील हरदा को वर्ष 1913 में स्थापित किया गया था।

भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में, हरदा स्वतंत्रता सेनानी पहली पंक्ति में थे। वर्ष 1916 में लोकमान्य तिलक ने हरदा का दौरा किया जिसने हरदा में कांग्रेस को ओर अधिक शक्ति प्रदान की । दिनांक 08-12-1933 को महात्मा गांधी ने हरिजन कल्याण के लिए हरदा का दौरा किया। बापूजी ने 4 घंटे तक हरदा की यात्रा की। बापूजी ने हरदा के अधिकारियों और स्वयंसेवकों के काम की प्रशंसा की।

हरदा – प्रो. महेशदत्तजी मेशर का जन्म स्थान है, जो महात्मा गांधी के साथ बहुत निकटता से जुड़े थे।

15 अगस्त 1947 को एस.डी.ओ. श्री बेरेठा ने हरदा के पुलिस स्टेशन पर भारतीय ध्वज फैराया था |